श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.51

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यः श्रद्धयैतद् भगवत्प्रियाणां

पाण्डोः सुतानामिति सम्प्रयाणम्।

शृणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रं

लब्ध्वा हरौ भक्तिमुपैति सिद्धिम्॥ ५१

yaḥ śraddhayaitad bhagavatpriyāṇāṃ

pāṇḍoḥ sutānāmiti samprayāṇam|

śṛṇotyalaṃ svastyayanaṃ pavitraṃ

labdhvā harau bhaktimupaiti siddhim|| 51

अर्थ

भगवान्‌के प्यारे भक्त पाण्डवोंके महाप्रयाणकी इस परम पवित्र और मंगलमयी कथाको जो पुरुष श्रद्धासे सुनता है, वह निश्‍चय ही भगवान्‌की भक्ति और मोक्ष प्राप्त करता है॥ ५१॥✎ 104

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
पाण्डवस्वर्गारोहणं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #104 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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