॥ श्रीहरिः ॥
यस्य क्षणवियोगेन लोको ह्यप्रियदर्शनः।
उक्थेन रहितो ह्येष मृतकः प्रोच्यते यथा॥ ६
yasya kṣaṇaviyogena loko hyapriyadarśanaḥ|
ukthena rahito hyeṣa mṛtakaḥ procyate yathā|| 6
अर्थ
जैसे यह शरीर प्राणसे रहित होनेपर मृतक कहलाता है, वैसे ही उनके क्षणभरके वियोगसे यह संसार अप्रिय दीखने लगता है॥ ६॥
यस्य क्षणवियोगेन लोको ह्यप्रियदर्शनः।
उक्थेन रहितो ह्येष मृतकः प्रोच्यते यथा॥ ६
जैसे यह शरीर प्राणसे रहित होनेपर मृतक कहलाता है, वैसे ही उनके क्षणभरके वियोगसे यह संसार अप्रिय दीखने लगता है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.15.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 151) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/15/6/