श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.7

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यत्संश्रयाद् द्रुपदगेहमुपागतानां

राज्ञां स्वयंवरमुखे स्मरदुर्मदानाम्।

तेजो हृतं खलु मयाभिहतश्‍च मत्स्यः

सज्जीकृतेन धनुषाधिगता च कृष्णा॥ ७

yatsaṃśrayād drupadagehamupāgatānāṃ

rājñāṃ svayaṃvaramukhe smaradurmadānām|

tejo hṛtaṃ khalu mayābhihataśca matsyaḥ

sajjīkṛtena dhanuṣādhigatā ca kṛṣṇā|| 7

अर्थ

उनके आश्रयसे द्रौपदी-स्वयंवरमें राजा द्रुपदके घर आये हुए कामोन्मत्त राजाओंका तेज मैंने हरण कर लिया, धनुषपर बाण चढ़ाकर मत्स्यवेध किया और इस प्रकार द्रौपदीको प्राप्त किया था॥ ७॥

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