श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.15.8

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यत्संनिधावहमु खाण्डवमग्नयेऽदा-

मिन्द्रं च सामरगणं तरसा विजित्य।

लब्धा सभा मयकृताद्भुतशिल्पमाया

दिग्भ्योऽहरन्‍नृपतयो बलिमध्वरे ते॥ ८

yatsaṃnidhāvahamu khāṇḍavamagnaye'dā-

mindraṃ ca sāmaragaṇaṃ tarasā vijitya|

labdhā sabhā mayakṛtādbhutaśilpamāyā

digbhyo'harannṛpatayo balimadhvare te|| 8

अर्थ

उनकी सन्‍निधिमात्रसे मैंने समस्त देवताओंके साथ इन्द्रको अपने बलसे जीतकर अग्‍निदेवको उनकी तृप्तिके लिये खाण्डव वनका दान कर दिया और मय दानवकी निर्माण की हुई, अलौकिक कलाकौशलसे युक्त मायामयी सभा प्राप्त की और आपके यज्ञमें सब ओरसे आ-आकर राजाओंने अनेकों प्रकारकी भेंटें समर्पित कीं॥ ८॥

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