श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.16.19

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

धर्म उवाच✎ 1865

कच्चिद्भद्रेऽनामयमात्मनस्ते

विच्छायासि म्लायतेषन्मुखेन।

आलक्षये भवतीमन्तराधिं

दूरे बन्धुं शोचसि कञ्चनाम्ब॥ १९

kaccidbhadre'nāmayamātmanaste

vicchāyāsi mlāyateṣanmukhena|

ālakṣaye bhavatīmantarādhiṃ

dūre bandhuṃ śocasi kañcanāmba|| 19

अर्थ

धर्मने कहा—कल्याणि! कुशलसे तो हो न? तुम्हारा मुख कुछ-कुछ मलिन हो रहा है। तुम श्रीहीन हो रही हो, मालूम होता है तुम्हारे हृदयमें कुछ-न-कुछ दुःख अवश्य है। क्या तुम्हारा कोई सम्बन्धी दूर देशमें चला गया है, जिसके लिये तुम इतनी चिन्ता कर रही हो?॥ १९॥

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