॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.16.35
का वा सहेत विरहं पुरुषोत्तमस्य
प्रेमावलोकरुचिरस्मितवल्गुजल्पैः।
स्थैर्यं समानमहरन्मधुमानिनीनां
रोमोत्सवो मम यदङ्घ्रि विटङ्कितायाः॥ ३५
kā vā saheta virahaṃ puruṣottamasya
premāvalokarucirasmitavalgujalpaiḥ|
sthairyaṃ samānamaharanmadhumāninīnāṃ
romotsavo mama yadaṅghri viṭaṅkitāyāḥ|| 35
अर्थ
जिन्होंने अपनी प्रेमभरी चितवन, मनोहर मुसकान और मीठी-मीठी बातोंसे सत्यभामा आदि मधुमयी मानिनियोंके मानके साथ धीरजको भी छीन लिया था और जिनके चरणकमलोंके स्पर्शसे मैं निरन्तर आनन्दसे पुलकित रहती थी, उन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णका विरह भला कौन सह सकती है॥ ३५॥