nidrayā hriyate naktaṃ divā ca vyarthakarmabhiḥ|| 9
अर्थ
एक तो थोड़ी आयु और दूसरे कम समझ। ऐसी अवस्थामें संसारके मन्दभाग्य विषयी पुरुषोंकी आयु व्यर्थ ही बीती जा रही है—नींदमें रात और व्यर्थके कामोंमें दिन॥ ९॥✎ 105
मन्दस्य मन्दप्रज्ञस्य वयो मन्दायुषश्च वै।
निद्रया ह्रियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभिः॥ ९
एक तो थोड़ी आयु और दूसरे कम समझ। ऐसी अवस्थामें संसारके मन्दभाग्य विषयी पुरुषोंकी आयु व्यर्थ ही बीती जा रही है—नींदमें रात और व्यर्थके कामोंमें दिन॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.16.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 158) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/16/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)