अब ये उनसे बिछुड़ गयी हैं। वे साध्वी अभागिनीके समान नेत्रोंमें जल भरकर यह चिन्ता कर रही हैं कि अब राजाका स्वाँग बनाकर ब्राह्मणद्रोही शूद्र मुझे भोगेंगे॥ २७॥✎ 107
शोचत्यश्रुकला साध्वी दुर्भगेवोज्झिताधुना।
अब्रह्मण्या नृपव्याजाः शूद्रा भोक्ष्यन्ति मामिति॥ २७
अब ये उनसे बिछुड़ गयी हैं। वे साध्वी अभागिनीके समान नेत्रोंमें जल भरकर यह चिन्ता कर रही हैं कि अब राजाका स्वाँग बनाकर ब्राह्मणद्रोही शूद्र मुझे भोगेंगे॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 165) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)