श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

शोचत्यश्रुकला साध्वी दुर्भगेवोज्झिताधुना।

अब्रह्मण्या नृपव्याजाः शूद्रा भोक्ष्यन्ति मामिति॥ २७

śocatyaśrukalā sādhvī durbhagevojjhitādhunā|

abrahmaṇyā nṛpavyājāḥ śūdrā bhokṣyanti māmiti|| 27

अर्थ

अब ये उनसे बिछुड़ गयी हैं। वे साध्वी अभागिनीके समान नेत्रोंमें जल भरकर यह चिन्ता कर रही हैं कि अब राजाका स्वाँग बनाकर ब्राह्मणद्रोही शूद्र मुझे भोगेंगे॥ २७॥✎ 107

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #107 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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