॥ श्रीहरिः ॥
वृषस्य नष्टांस्त्रीन् पादान् तपः शौचं दयामिति।
प्रतिसंदध आश्वास्य३ महीं च समवर्धयत्॥ ४२
vṛṣasya naṣṭāṃstrīn pādān tapaḥ śaucaṃ dayāmiti|
pratisaṃdadha āśvāsya mahīṃ ca samavardhayat|| 42
अर्थ
राजा परीक्षित्ने इसके बाद वृषभरूप धर्मके तीनों चरण—तपस्या, शौच और दया जोड़ दिये और आश्वासन देकर पृथ्वीका संवर्धन किया॥ ४२॥
वृषस्य नष्टांस्त्रीन् पादान् तपः शौचं दयामिति।
प्रतिसंदध आश्वास्य महीं च समवर्धयत्॥ ४२
राजा परीक्षित्ने इसके बाद वृषभरूप धर्मके तीनों चरण—तपस्या, शौच और दया जोड़ दिये और आश्वासन देकर पृथ्वीका संवर्धन किया॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 167) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/42/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—आस्थाय—
(मुद्रित पृष्ठ 167)