श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.17.43

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

स एष एतर्ह्यध्यास्त४ आसनं पार्थिवोचितम्।

पितामहेनोपन्यस्तं राज्ञारण्यं विविक्षता॥ ४३

sa eṣa etarhyadhyāsta āsanaṃ pārthivocitam|

pitāmahenopanyastaṃ rājñāraṇyaṃ vivikṣatā|| 43

अर्थ

वे ही महाराजा परीक्षित् इस समय अपने राजसिंहासनपर, जिसे उनके पितामह महाराज युधिष्ठिरने वनमें जाते समय उन्हें दिया था, विराजमान हैं।॥ ४३॥

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—एतदध्यास्त।

    (मुद्रित पृष्ठ 167)

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