वे ही महाराजा परीक्षित् इस समय अपने राजसिंहासनपर, जिसे उनके पितामह महाराज युधिष्ठिरने वनमें जाते समय उन्हें दिया था, विराजमान हैं।॥ ४३॥
स एष एतर्ह्यध्यास्त आसनं पार्थिवोचितम्।
पितामहेनोपन्यस्तं राज्ञारण्यं विविक्षता॥ ४३
वे ही महाराजा परीक्षित् इस समय अपने राजसिंहासनपर, जिसे उनके पितामह महाराज युधिष्ठिरने वनमें जाते समय उन्हें दिया था, विराजमान हैं।॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.17.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 167) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/17/43/