उन्होंने सबकी आसक्ति छोड़ दी, गंगातटपर जाकर श्रीशुकदेवजीसे उपदेश ग्रहण किया और इस प्रकार भगवान्के स्वरूपको जानकर अपने शरीरको त्याग दिया॥ ३॥✎ 109
उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञाताजितसंस्थितिः।
वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वं कलेवरम्॥ ३
उन्होंने सबकी आसक्ति छोड़ दी, गंगातटपर जाकर श्रीशुकदेवजीसे उपदेश ग्रहण किया और इस प्रकार भगवान्के स्वरूपको जानकर अपने शरीरको त्याग दिया॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 168) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)