श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.18.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ब्राह्मणैः क्षत्रबन्धुर्हि द्वारपालो ३निरूपितः।✎ 1873

स कथं तद‍्गृहे द्वाःस्थः सभाण्डं भोक्तु४मर्हति॥ ३४

brāhmaṇaiḥ kṣatrabandhurhi dvārapālo nirūpitaḥ|

sa kathaṃ tadgṛhe dvāḥsthaḥ sabhāṇḍaṃ bhoktumarhati|| 34

अर्थ

ब्राह्मणोंने क्षत्रियोंको अपना द्वारपाल बनाया है। उन्हें द्वारपर रहकर रक्षा करनी चाहिये, घरमें घुसकर स्वामीके बर्तनोंमें खानेका उसे अधिकार नहीं है॥ ३४॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—गृहपालो।

    (मुद्रित पृष्ठ 172)
  2. ४

    प्रा० पा०—भङ्क्तु।

    (मुद्रित पृष्ठ 172)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1873 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): द्वारपालोनिरू → द्वारपालो निरू

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