स कथं तद्गृहे द्वाःस्थः सभाण्डं भोक्तु४मर्हति॥ ३४
brāhmaṇaiḥ kṣatrabandhurhi dvārapālo nirūpitaḥ|
sa kathaṃ tadgṛhe dvāḥsthaḥ sabhāṇḍaṃ bhoktumarhati|| 34
अर्थ
ब्राह्मणोंने क्षत्रियोंको अपना द्वारपाल बनाया है। उन्हें द्वारपर रहकर रक्षा करनी चाहिये, घरमें घुसकर स्वामीके बर्तनोंमें खानेका उसे अधिकार नहीं है॥ ३४॥
ब्राह्मणैः क्षत्रबन्धुर्हि द्वारपालो निरूपितः।
स कथं तद्गृहे द्वाःस्थः सभाण्डं भोक्तुमर्हति॥ ३४
ब्राह्मणोंने क्षत्रियोंको अपना द्वारपाल बनाया है। उन्हें द्वारपर रहकर रक्षा करनी चाहिये, घरमें घुसकर स्वामीके बर्तनोंमें खानेका उसे अधिकार नहीं है॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.18.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 172) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/18/34/
टिप्पणियाँ
३
प्रा० पा०—गृहपालो।
(मुद्रित पृष्ठ 172)
४
प्रा० पा०—भङ्क्तु।
(मुद्रित पृष्ठ 172)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1873 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): द्वारपालोनिरू → द्वारपालो निरू