श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.35

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

अपि मे भगवान् प्रीतः कृष्णः पाण्डुसुतप्रियः।

पैतृष्वसेयप्रीत्यर्थं तद्गोत्रस्यात्तबान्धवः॥ ३५

api me bhagavān prītaḥ kṛṣṇaḥ pāṇḍusutapriyaḥ|

paitṛṣvaseyaprītyarthaṃ tadgotrasyāttabāndhavaḥ|| 35

अर्थ

अवश्य ही पाण्डवोंके सुहृद‍् भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर अत्यन्त प्रसन्‍न हैं; उन्होंने अपने फुफेरे भाइयोंकी प्रसन्‍नताके लिये उन्हींके कुलमें उत्पन्‍न हुए मेरे साथ भी अपनेपनका व्यवहार किया है ॥ ३५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें