॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.2.12
तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया१।
पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतगृहीतया॥ १२
tacchraddadhānā munayo jñānavairāgyayuktayā|
paśyantyātmani cātmānaṃ bhaktyā śrutagṛhītayā|| 12
अर्थ
श्रद्धालु मुनिजन भागवतश्रवणसे प्राप्त ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्तिसे अपने हृदयमें उस परमतत्त्वरूप परमात्माका अनुभव करते हैं॥ १२॥ शौनकादि ऋषियो! यही कारण है कि अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुसार मनुष्य जो धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसकी पूर्ण सिद्धि इसीमें है कि भगवान् प्रसन्न हों॥ १३॥ इसलिये एकाग्र मनसे भक्तवत्सल भगवान्का ही नित्य-निरन्तर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधन करना चाहिये॥ १४॥ कर्मोंकी गाँठ बड़ी कड़ी है। विचारवान् पुरुष भगवान्के चिन्तनकी तलवारसे उस गाँठको काट डालते हैं। तब भला, ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो भगवान्की लीलाकथामें प्रेम न करे॥ १५॥ ✎ 26
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—युक्तयः।