श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.13

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।

स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥ १३

ataḥ pumbhirdvijaśreṣṭhā varṇāśramavibhāgaśaḥ|

svanuṣṭhitasya dharmasya saṃsiddhirharitoṣaṇam|| 13

अर्थ

शौनकादि ऋषियो! यही कारण है कि अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुसार मनुष्य जो धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसकी पूर्ण सिद्धि इसीमें है कि भगवान् प्रसन्‍न हों॥ १३॥✎ 26

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #26 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें