शौनकादि ऋषियो! यही कारण है कि अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुसार मनुष्य जो धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसकी पूर्ण सिद्धि इसीमें है कि भगवान् प्रसन्न हों॥ १३॥✎ 26
अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥ १३
शौनकादि ऋषियो! यही कारण है कि अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुसार मनुष्य जो धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसकी पूर्ण सिद्धि इसीमें है कि भगवान् प्रसन्न हों॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 86) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)