श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.29

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरं तपः।

वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरा गतिः॥ २९

vāsudevaparaṃ jñānaṃ vāsudevaparaṃ tapaḥ|

vāsudevaparo dharmo vāsudevaparā gatiḥ|| 29

अर्थ

ज्ञानसे ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णकी ही प्राप्ति होती है। तपस्या श्रीकृष्णकी प्रसन्‍नताके लिये ही की जाती है। श्रीकृष्णके लिये ही धर्मोंका अनुष्ठान होता है और सब गतियाँ श्रीकृष्णमें ही समा जाती हैं॥ २९॥

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