ये सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण उसी मायाके विलास हैं; इनके भीतर रहकर भगवान् इनसे युक्त-सरीखे मालूम पड़ते हैं। वास्तवमें तो वे परिपूर्ण विज्ञानानन्दघन हैं॥ ३१॥
तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव।
अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः॥ ३१
ये सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण उसी मायाके विलास हैं; इनके भीतर रहकर भगवान् इनसे युक्त-सरीखे मालूम पड़ते हैं। वास्तवमें तो वे परिपूर्ण विज्ञानानन्दघन हैं॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 88) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/31/