॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.2.32
यथा ह्यवहितो वह्निर्दारुष्वेकः स्वयोनिषु।
नानेव भाति विश्वात्मा भूतेषु च तथा पुमान्॥ ३२
yathā hyavahito vahnirdāruṣvekaḥ svayoniṣu|
nāneva bhāti viśvātmā bhūteṣu ca tathā pumān|| 32
अर्थ
अग्नि तो वस्तुतः एक ही है, परंतु जब वह अनेक प्रकारकी लकड़ियोंमें प्रकट होती है तब अनेक-सी मालूम पड़ती है। वैसे ही सबके आत्मरूप भगवान् तो एक ही हैं, परंतु प्राणियोंकी अनेकतासे अनेक-जैसे जान पड़ते हैं॥ ३२॥