श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः।

स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद‍्गुणान्॥ ३३

asau guṇamayairbhāvairbhūtasūkṣmendriyātmabhiḥ|

svanirmiteṣu nirviṣṭo bhuṅkte bhūteṣu tadguṇān|| 33

अर्थ

भगवान् ही सूक्ष्म भूत—तन्मात्रा, इन्द्रिय तथा अन्तःकरण आदि गुणोंके विकारभूत भावोंके द्वारा नाना प्रकारकी योनियोंका निर्माण करते हैं और उनमें भिन्‍न-भिन्‍न जीवोंके रूपमें प्रवेश करके उन-उन योनियोंके अनुरूप विषयोंका उपभोग करते-कराते हैं॥ ३३॥

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