श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.5

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

मुनयः साधु पृष्टोऽहं भवद्भिर्लोकमङ्गलम्।

यत्कृतः कृष्णसंप्रश्नो येनात्मा सुप्रसीदति॥ ५

munayaḥ sādhu pṛṣṭo'haṃ bhavadbhirlokamaṅgalam|

yatkṛtaḥ kṛṣṇasaṃpraśno yenātmā suprasīdati|| 5

अर्थ

ऋषियो! आपने सम्पूर्ण विश्‍वके कल्याणके लिये यह बहुत सुन्दर प्रश्न किया है; क्योंकि यह प्रश्न श्रीकृष्णके सम्बन्धमें है और इससे भलीभाँति आत्मशुद्धि हो जाती है॥ ५॥✎ 25

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #25 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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