श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.6

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।

अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति॥ ६      

sa vai puṃsāṃ paro dharmo yato bhaktiradhokṣaje|

ahaitukyapratihatā yayā''tmā samprasīdati|| 6

अर्थ

मनुष्योंके लिये सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिससे भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति हो—भक्ति भी ऐसी, जिसमें किसी प्रकारकी कामना न हो और जो नित्य-निरन्तर बनी रहे; ऐसी भक्तिसे हृदय आनन्दस्वरूप परमात्माकी उपलब्धि करके कृतकृत्य हो जाता है॥ ६॥✎ 25

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #25 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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