॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.2.6
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययाऽऽत्मा सम्प्रसीदति॥ ६
sa vai puṃsāṃ paro dharmo yato bhaktiradhokṣaje|
ahaitukyapratihatā yayā''tmā samprasīdati|| 6
अर्थ
मनुष्योंके लिये सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिससे भगवान् श्रीकृष्णमें भक्ति हो—भक्ति भी ऐसी, जिसमें किसी प्रकारकी कामना न हो और जो नित्य-निरन्तर बनी रहे; ऐसी भक्तिसे हृदय आनन्दस्वरूप परमात्माकी उपलब्धि करके कृतकृत्य हो जाता है॥ ६॥✎ 25