nārthasya dharmaikāntasya kāmo lābhāya hi smṛtaḥ|| 9
अर्थ
धर्मका फल है मोक्ष। उसकी सार्थकता अर्थप्राप्तिमें नहीं है। अर्थ केवल धर्मके लिये है। भोगविलास उसका फल नहीं माना गया है॥ ९॥✎ 25
धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्य नार्थोऽर्थायोपकल्पते।
नार्थस्य धर्मैकान्तस्य कामो लाभाय हि स्मृतः॥ ९
धर्मका फल है मोक्ष। उसकी सार्थकता अर्थप्राप्तिमें नहीं है। अर्थ केवल धर्मके लिये है। भोगविलास उसका फल नहीं माना गया है॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 85) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/2/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)