श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.8

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः।

नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि केवलम्॥ ८

dharmaḥ svanuṣṭhitaḥ puṃsāṃ viṣvaksenakathāsu yaḥ|

notpādayedyadi ratiṃ śrama eva hi kevalam|| 8

अर्थ

धर्मका ठीक-ठीक अनुष्ठान करनेपर भी यदि मनुष्यके हृदयमें भगवान्‌की लीला-कथाओंके प्रति अनुरागका उदय न हो तो वह निरा श्रम-ही-श्रम है॥ ८॥✎ 25

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #25 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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