अठारहवीं बार देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेकी इच्छासे उन्होंने राजाके रूपमें रामावतार ग्रहण किया और सेतुबन्धन, रावणवध आदि वीरतापूर्ण बहुत-सी लीलाएँ कीं॥ २२॥✎ 3031
नरदेवत्वमापन्नः सुरकार्यचिकीर्षया।
समुद्रनिग्रहादीनि चक्रे वीर्याण्यतः परम्॥ २२
अठारहवीं बार देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेकी इच्छासे उन्होंने राजाके रूपमें रामावतार ग्रहण किया और सेतुबन्धन, रावणवध आदि वीरतापूर्ण बहुत-सी लीलाएँ कीं॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.3.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 90) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/3/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)