श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.41

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

निःश्रेयसाय लोकस्य धन्यं स्वस्त्ययनं महत्।

तदिदं ग्राहयामास सुतमात्मवतां वरम्॥ ४१

niḥśreyasāya lokasya dhanyaṃ svastyayanaṃ mahat|

tadidaṃ grāhayāmāsa sutamātmavatāṃ varam|| 41

अर्थ

उन्होंने इस श्लाघनीय, कल्याणकारी और महान् पुराणको लोगोंके परम कल्याणके लिये अपने आत्मज्ञानिशिरोमणि पुत्रको ग्रहण कराया॥ ४१॥

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