श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.7

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

द्वितीयं तु भवायास्य रसातलगतां महीम्।

उद्धरिष्यन्‍नुपादत्त यज्ञेशः सौकरं वपुः॥ ७

dvitīyaṃ tu bhavāyāsya rasātalagatāṃ mahīm|

uddhariṣyannupādatta yajñeśaḥ saukaraṃ vapuḥ|| 7

अर्थ

दूसरी बार इस संसारके कल्याणके लिये समस्त यज्ञोंके स्वामी उन भगवान्‌ने ही रसातलमें गयी हुई पृथ्वीको निकाल लानेके विचारसे सूकररूप ग्रहण किया॥ ७॥✎ 29

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #29 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें