श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.11

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

नमन्ति यत्पादनिकेतमात्मनः

शिवाय हानीय धनानि शत्रवः।

कथं स वीरः श्रियमंग दुस्त्यजां

युवैषतोत्स्रष्टुमहो सहासुभिः॥ ११

namanti yatpādaniketamātmanaḥ

śivāya hānīya dhanāni śatravaḥ|

kathaṃ sa vīraḥ śriyamaṃga dustyajāṃ

yuvaiṣatotsraṣṭumaho sahāsubhiḥ|| 11

अर्थ

शत्रुगण अपने भलेके लिये बहुत-सा धन लाकर उनके चरण रखनेकी चौकीको नमस्कार करते थे। वे एक वीर युवक थे। उन्होंने उस दुस्त्यज लक्ष्मीको, अपने प्राणोंके साथ भला, क्यों त्याग देनेकी इच्छा की॥ ११॥✎ 1278 1279

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1278 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पाण्डव-नन्दन → पाण्डवनन्दन
  • #1279 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नगर-वासियोंने → नगरवासियोंने

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