शत्रुगण अपने भलेके लिये बहुत-सा धन लाकर उनके चरण रखनेकी चौकीको नमस्कार करते थे। वे एक वीर युवक थे। उन्होंने उस दुस्त्यज लक्ष्मीको, अपने प्राणोंके साथ भला, क्यों त्याग देनेकी इच्छा की॥ ११॥✎ 12781279
नमन्ति यत्पादनिकेतमात्मनः
शिवाय हानीय धनानि शत्रवः।
कथं स वीरः श्रियमंग दुस्त्यजां
युवैषतोत्स्रष्टुमहो सहासुभिः॥ ११
शत्रुगण अपने भलेके लिये बहुत-सा धन लाकर उनके चरण रखनेकी चौकीको नमस्कार करते थे। वे एक वीर युवक थे। उन्होंने उस दुस्त्यज लक्ष्मीको, अपने प्राणोंके साथ भला, क्यों त्याग देनेकी इच्छा की॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.4.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 95) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/4/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1278 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पाण्डव-नन्दन → पाण्डवनन्दन
#1279 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नगर-वासियोंने → नगरवासियोंने