श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.12

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

शिवाय लोकस्य भवाय भूतये

य उत्तमश्लोकपरायणा जनाः।

जीवन्ति नात्मार्थमसौ पराश्रयं

मुमोच निर्विद्य कुतः कलेवरम्॥ १२

śivāya lokasya bhavāya bhūtaye

ya uttamaślokaparāyaṇā janāḥ|

jīvanti nātmārthamasau parāśrayaṃ

mumoca nirvidya kutaḥ kalevaram|| 12

अर्थ

जिन लोगोंका जीवन भगवान्‌के आश्रित है, वे तो संसारके परम कल्याण, अभ्युदय और समृद्धिके लिये ही जीवन धारण करते हैं। उसमें उनका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता। उनका शरीर तो दूसरोंके हितके लिये था, उन्होंने विरक्त होकर उसका परित्याग क्यों किया॥ १२॥✎ 1278 1279

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1278 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पाण्डव-नन्दन → पाण्डवनन्दन
  • #1279 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नगर-वासियोंने → नगरवासियोंने

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