शौनकादि ऋषियो! यद्यपि व्यासजी इस प्रकार अपनी पूरी शक्तिसे सदा-सर्वदा प्राणियोंके कल्याणमें ही लगे रहे, तथापि उनके हृदयको सन्तोष नहीं हुआ॥ २६॥✎ 36373839
एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः।
सर्वात्मकेनापि यदा नातुष्यद्धृदयं ततः॥ २६
शौनकादि ऋषियो! यद्यपि व्यासजी इस प्रकार अपनी पूरी शक्तिसे सदा-सर्वदा प्राणियोंके कल्याणमें ही लगे रहे, तथापि उनके हृदयको सन्तोष नहीं हुआ॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.4.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 96) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/4/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)