श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.25

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

स्त्रीशूद्रद्विजबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा।

कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह।

इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम्॥ २५

strīśūdradvijabandhūnāṃ trayī na śrutigocarā|

karmaśreyasi mūḍhānāṃ śreya evaṃ bhavediha|

iti bhāratamākhyānaṃ kṛpayā muninā kṛtam|| 25

अर्थ

स्त्री, शूद्र और पतित द्विजाति—तीनों ही वेद-श्रवणके अधिकारी नहीं हैं। इसलिये वे कल्याणकारी शास्त्रोक्त कर्मोंके आचरणमें भूल कर बैठते हैं। अब इसके द्वारा उनका भी कल्याण हो जाय, यह सोचकर महामुनि व्यासजीने बड़ी कृपा करके महाभारत इतिहासकी रचना की॥ २५॥✎ 36 37 38 39

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #36 शब्दोंके बीचका स्थान: कोभी → को भी
  • #37 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #38 शब्दोंके बीचका स्थान: कोप्राप्त → को प्राप्त
  • #39 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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