यद्यपि मैं ब्रह्मतेजसे सम्पन्न एवं समर्थ हूँ, तथापि मेरा हृदय कुछ अपूर्णकाम-सा जान पड़ता है॥ ३०॥✎ 36373839
तथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवात्मना विभुः।
असम्पन्न इवाभाति ब्रह्मवर्चस्यसत्तमः॥ ३०
यद्यपि मैं ब्रह्मतेजसे सम्पन्न एवं समर्थ हूँ, तथापि मेरा हृदय कुछ अपूर्णकाम-सा जान पड़ता है॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.4.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 96) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/4/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)