श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.31

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः।

प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः॥ ३१

kiṃ vā bhāgavatā dharmā na prāyeṇa nirūpitāḥ|

priyāḥ paramahaṃsānāṃ ta eva hyacyutapriyāḥ|| 31

अर्थ

अवश्य ही अबतक मैंने भगवान्‌को प्राप्त करानेवाले धर्मोंका प्रायः निरूपण नहीं किया है। वे ही धर्म परमहंसोंको प्रिय हैं और वे ही भगवान्‌को भी प्रिय हैं (हो-न-हो मेरी अपूर्णताका यही कारण है)’॥ ३१॥✎ 36 37 38 39

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #36 शब्दोंके बीचका स्थान: कोभी → को भी
  • #37 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #38 शब्दोंके बीचका स्थान: कोप्राप्त → को प्राप्त
  • #39 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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