श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.32

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तस्यैवं खिलमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः।

कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम्॥ ३२

tasyaivaṃ khilamātmānaṃ manyamānasya khidyataḥ|

kṛṣṇasya nārado'bhyāgādāśramaṃ prāgudāhṛtam|| 32

अर्थ

श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास इस प्रकार अपनेको अपूर्ण-सा मानकर जब खिन्‍न हो रहे थे, उसी समय पूर्वोक्त आश्रमपर देवर्षि नारदजी आ पहुँचे॥ ३२॥

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