श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.29

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तस्यैवं मेऽनुरक्तस्य प्रश्रितस्य हतैनसः।

श्रद्दधानस्य बालस्य दान्तस्यानुचरस्य च॥ २९

tasyaivaṃ me'nuraktasya praśritasya hatainasaḥ|

śraddadhānasya bālasya dāntasyānucarasya ca|| 29

अर्थ

मैं उनका बड़ा ही अनुरागी था, विनयी था; उन लोगोंकी सेवासे मेरे पाप नष्ट हो चुके थे। मेरे हृदयमें श्रद्धा थी, इन्द्रियोंमें संयम था एवं शरीर, वाणी और मनसे मैं उनका आज्ञाकारी था॥ २९॥✎ 48 49

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #48 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #49 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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