श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.38

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

इति मूर्त्यभिधानेन मन्त्रमूर्तिममूर्तिकम्।

यजते यज्ञपुरुषं स सम्यग्दर्शनः पुमान्॥ ३८

iti mūrtyabhidhānena mantramūrtimamūrtikam|

yajate yajñapuruṣaṃ sa samyagdarśanaḥ pumān|| 38

अर्थ

इस प्रकार जो पुरुष चतुर्व्यूहरूपी भगवन्मूर्तियोंके नामद्वारा प्राकृतमूर्तिरहित अप्राकृत मन्त्रमूर्ति भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन करता है, उसीका ज्ञान पूर्ण एवं यथार्थ है॥ ३८॥✎ 50 51 52

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #50 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #51 शब्दोंके बीचका स्थान: कोसमर्पित → को समर्पित
  • #52 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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