श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.40

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः

समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम्।

आख्याहि दुःखैर्मुहुरर्दितात्मनां

संक्लेशनिर्वाणमुशन्ति नान्यथा॥ ४०

tvamapyadabhraśruta viśrutaṃ vibhoḥ

samāpyate yena vidāṃ bubhutsitam|

ākhyāhi duḥkhairmuhurarditātmanāṃ

saṃkleśanirvāṇamuśanti nānyathā|| 40

अर्थ

व्यासजी! आपका ज्ञान पूर्ण है; आप भगवान्‌की ही कीर्तिका—उनकी प्रेममयी लीलाका वर्णन कीजिये। उसीसे बड़े-बड़े ज्ञानियोंकी भी जिज्ञासा पूर्ण होती है। जो लोग दुःखोंके द्वारा बार-बार रौंदे जा रहे हैं, उनके दुःखकी शान्ति इसीसे हो सकती है और कोई उपाय नहीं है॥ ४०॥✎ 53 54

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
व्यासनारदसंवादे पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #53 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #54 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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