मैंने समझा, भक्तोंका मंगल चाहनेवाले भगवान्का यह भी एक अनुग्रह ही है। इसके बाद मैं उत्तर दिशाकी ओर चल पड़ा॥ १०॥
तदा तदहमीशस्य भक्तानां शमभीप्सतः।
अनुग्रहं मन्यमानः प्रातिष्ठं दिशमुत्तराम्॥ १०
मैंने समझा, भक्तोंका मंगल चाहनेवाले भगवान्का यह भी एक अनुग्रह ही है। इसके बाद मैं उत्तर दिशाकी ओर चल पड़ा॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 103) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/6/10/