श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.18

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

प्रेमातिभरनिर्भिन्‍नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।

आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने॥ १८

premātibharanirbhinnapulakāṅgo'tinirvṛtaḥ |

ānandasamplave līno nāpaśyamubhayaṃ mune|| 18

अर्थ

व्यासजी! उस समय प्रेमभावके अत्यन्त उद्रेकसे मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा। हृदय अत्यन्त शान्त और शीतल हो गया। उस आनन्दकी बाढ़में मैं ऐसा डूब गया कि मुझे अपना और ध्येय वस्तुका तनिक भी भान न रहा॥ १८॥

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