श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.19

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

रूपं भगवतो यत्तन्मनःकान्तं शुचापहम्।

अपश्यन् सहसोत्तस्थे वैक्लव्याद्दुर्मना इव॥ १९

rūpaṃ bhagavato yattanmanaḥkāntaṃ śucāpaham|

apaśyan sahasottasthe vaiklavyāddurmanā iva|| 19

अर्थ

भगवान्‌का वह अनिर्वचनीय रूप समस्त शोकोंका नाश करनेवाला और मनके लिये अत्यन्त लुभावना था। सहसा उसे न देख मैं बहुत ही विकल हो गया और अनमना-सा होकर आसनसे उठ खड़ा हुआ॥ १९॥

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