श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.27

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नामान्यनन्तस्य हतत्रपः पठन्

गुह्यानि भद्राणि कृतानि च स्मरन्।

गां पर्यटंस्तुष्टमना गतस्पृहः

कालं प्रतीक्षन् विमदो१ विमत्सरः॥ २७

nāmānyanantasya hatatrapaḥ paṭhan

guhyāni bhadrāṇi kṛtāni ca smaran|

gāṃ paryaṭaṃstuṣṭamanā gataspṛhaḥ

kālaṃ pratīkṣan vimado vimatsaraḥ|| 27

अर्थ

तभीसे मैं लज्जा-संकोच छोड़कर भगवान्‌के अत्यन्त रहस्यमय और मंगलमय मधुर नामों और लीलाओंका कीर्तन और स्मरण करने लगा। स्पृहा और मद-मत्सर मेरे हृदयसे पहले ही निवृत्त हो चुके थे, अब मैं आनन्दसे कालकी प्रतीक्षा करता हुआ पृथ्वीपर विचरने लगा॥ २७॥✎ 55 56 57

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—प्रतीक्षन्‍नमदो।

    (मुद्रित पृष्ठ 105)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #55 शब्दोंके बीचका स्थान: कोसिर → को सिर
  • #56 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #57 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्‌ने,

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