श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.32

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अन्तर्बहिश्‍च लोकांस्त्रीन् पर्येम्यस्कन्दितव्रतः।

अनुग्रहा३न्महाविष्णोरविघातगतिः क्‍वचित्॥ ३२

antarbahiśca lokāṃstrīn paryemyaskanditavrataḥ|

anugrahānmahāviṣṇoravighātagatiḥ kvacit|| 32

अर्थ

तभीसे मैं भगवान्‌की कृपासे वैकुण्ठादिमें और तीनों लोकोंमें बाहर और भीतर बिना रोक-टोक विचरण किया करता हूँ। मेरे जीवनका व्रत भगवद्भजन अखण्डरूपसे चलता रहता है॥ ३२॥✎ 58 59 60 61 1280 1281

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—अनुग्रहादहं विष्णो।

    (मुद्रित पृष्ठ 105)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #58 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #59 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #60 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #61 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1280 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (प्रलय-कालीन → (प्रलयकालीन
  • #1281 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पांच-भौतिक → पांचभौतिक

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