॥ श्रीहरिः ॥
देवदत्तामिमां वीणां स्वरब्रह्मविभूषिताम्।
मूर्च्छयित्वा हरिकथां गायमानश्चराम्यहम्॥ ३३
devadattāmimāṃ vīṇāṃ svarabrahmavibhūṣitām|
mūrcchayitvā harikathāṃ gāyamānaścarāmyaham|| 33
अर्थ
भगवान्की दी हुई इस स्वरब्रह्मसे* विभूषित वीणापर तान छेड़कर मैं उनकी लीलाओंका गान करता हुआ सारे संसारमें विचरता हूँ॥ ३३॥✎ 58 59 60 61 1280 1281
देवदत्तामिमां वीणां स्वरब्रह्मविभूषिताम्।
मूर्च्छयित्वा हरिकथां गायमानश्चराम्यहम्॥ ३३
भगवान्की दी हुई इस स्वरब्रह्मसे विभूषित वीणापर तान छेड़कर मैं उनकी लीलाओंका गान करता हुआ सारे संसारमें विचरता हूँ॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 106) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/6/33/टिप्पणियाँ
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षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद्—ये सातों स्वर ब्रह्मव्यंजक होनेके नाते ही ब्रह्मरूप कहे गये हैं।
(मुद्रित पृष्ठ 106)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
- #58 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #59 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #60 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #61 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #1280 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (प्रलय-कालीन → (प्रलयकालीन
- #1281 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पांच-भौतिक → पांचभौतिक