श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

देवदत्तामिमां वीणां स्वरब्रह्मविभूषिताम्।

मूर्च्छयित्वा हरिकथां गायमानश्‍चराम्यहम्॥ ३३

devadattāmimāṃ vīṇāṃ svarabrahmavibhūṣitām|

mūrcchayitvā harikathāṃ gāyamānaścarāmyaham|| 33

अर्थ

भगवान्‌की दी हुई इस स्वरब्रह्मसे* विभूषित वीणापर तान छेड़कर मैं उनकी लीलाओंका गान करता हुआ सारे संसारमें विचरता हूँ॥ ३३॥✎ 58 59 60 61 1280 1281

टिप्पणियाँ

  1. *

    षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद्—ये सातों स्वर ब्रह्मव्यंजक होनेके नाते ही ब्रह्मरूप कहे गये हैं।

    (मुद्रित पृष्ठ 106)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #58 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #59 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #60 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #61 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1280 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (प्रलय-कालीन → (प्रलयकालीन
  • #1281 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पांच-भौतिक → पांचभौतिक

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