श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.37

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

सर्वं तदिदमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं त्वयानघ।

जन्मकर्मरहस्यं मे भवतश्चात्मतोषणम्॥ ३७

sarvaṃ tadidamākhyātaṃ yatpṛṣṭo'haṃ tvayānagha|

janmakarmarahasyaṃ me bhavataścātmatoṣaṇam|| 37

अर्थ

व्यासजी! आप निष्पाप हैं। आपने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब अपने जन्म और साधनाका रहस्य तथा आपकी आत्मतुष्टिका उपाय मैंने बतला दिया॥ ३७॥✎ 58 59 60 61 1280 1281

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #58 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #59 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #60 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #61 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1280 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (प्रलय-कालीन → (प्रलयकालीन
  • #1281 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पांच-भौतिक → पांचभौतिक

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