श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.38

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

सूत उवाच

एवं सम्भाष्य भगवान्‍नारदो वासवीसुतम्।

आमन्त्र्य वीणां रणयन् ययौ यादृच्छिको मुनिः॥ ३८

evaṃ sambhāṣya bhagavānnārado vāsavīsutam|

āmantrya vīṇāṃ raṇayan yayau yādṛcchiko muniḥ|| 38

अर्थ

श्रीसूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! देवर्षि नारदने व्यासजीसे इस प्रकार कहकर जानेकी अनुमति ली और वीणा बजाते हुए स्वच्छन्द विचरण करनेके लिये वे चल पड़े॥ ३८॥✎ 62

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #62 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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