श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.39

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

अहो देवर्षिर्धन्योऽयं यत्कीर्तिं१ शार्ङ्गधन्वनः।

गायन्माद्यन्‍निदं तन्त्र्या रमयत्यातुरं जगत्॥ ३९

aho devarṣirdhanyo'yaṃ yatkīrtiṃ śārṅgadhanvanaḥ|

gāyanmādyannidaṃ tantryā ramayatyāturaṃ jagat|| 39

अर्थ

अहा! ये देवर्षि नारद धन्य हैं; क्योंकि ये शार्ङ्गपाणि भगवान्‌की कीर्तिको अपनी वीणापर गा-गाकर स्वयं तो आनन्दमग्न होते ही हैं, साथ-साथ इस त्रितापतप्त जगत‍्को भी आनन्दित करते रहते हैं॥ ३९॥✎ 62

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे
व्यासनारदसंवादे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—यः कीर्तिं।

    (मुद्रित पृष्ठ 106)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #62 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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