श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.43

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

उवाच चासहन्त्यस्य बन्धनानयनं सती।

मुच्यतां मुच्यतामेष ब्राह्मणो नितरां गुरुः॥ ४३

uvāca cāsahantyasya bandhanānayanaṃ satī|

mucyatāṃ mucyatāmeṣa brāhmaṇo nitarāṃ guruḥ|| 43

अर्थ

गुरुपुत्रका इस प्रकार बाँधकर लाया जाना सती द्रौपदीको सहन नहीं हुआ। उसने कहा—‘छोड़ दो इन्हें, छोड़ दो। ये ब्राह्मण हैं, हमलोगोंके अत्यन्त पूजनीय हैं॥ ४३॥

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