श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.44

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

सरहस्यो धनुर्वेदः सविसर्गोपसंयमः।

अस्त्रग्रामश्‍च भवता शिक्षितो यदनुग्रहात्॥ ४४

sarahasyo dhanurvedaḥ savisargopasaṃyamaḥ|

astragrāmaśca bhavatā śikṣito yadanugrahāt|| 44

अर्थ

जिनकी कृपासे आपने रहस्यके साथ सारे धनुर्वेद और प्रयोग तथा उपसंहारके साथ सम्पूर्ण शस्त्रास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त किया है, वे आपके आचार्य द्रोण ही पुत्रके रूपमें आपके सामने खड़े हैं। उनकी अर्धांगिनी कृपी अपने वीर पुत्रकी ममतासे ही अपने पतिका अनुगमन नहीं कर सकीं, वे अभी जीवित हैं॥ ४४-४५॥

यह अर्थ श्लोक 44–45 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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