श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.49

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

सूत उवाच

धर्म्यं न्याय्यं सकरुणं निर्व्यलीकं समं महत्।

राजा धर्मसुतो राज्ञ्याः प्रत्यनन्दद्वचो द्विजाः॥ ४९

dharmyaṃ nyāyyaṃ sakaruṇaṃ nirvyalīkaṃ samaṃ mahat|

rājā dharmasuto rājñyāḥ pratyanandadvaco dvijāḥ|| 49

अर्थ

सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो! द्रौपदीकी बात धर्म और न्यायके अनुकूल थी। उसमें कपट नहीं था, करुणा और समता थी। अतएव राजा युधिष्ठिरने रानीके इन हितभरे श्रेष्ठ वचनोंका अभिनन्दन किया॥ ४९॥

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