न वेद कश्चिद्भगवंश्चिकीर्षितं तवेहमानस्य नृणां विडम्बनम्।
न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद् द्वेष्यश्च यस्मिन् विषमा मतिर्नृणाम्॥ २९
na veda kaścidbhagavaṃścikīrṣitaṃ tavehamānasya nṛṇāṃ viḍambanam|
na yasya kaściddayito'sti karhicid dveṣyaśca yasmin viṣamā matirnṛṇām|| 29
अर्थ
भगवन्! आप जब मनुष्योंकी-सी लीला करते हैं, तब आप क्या करना चाहते हैं—यह कोई नहीं जानता। आपका कभी कोई न प्रिय है और न अप्रिय। आपके सम्बन्धमें लोगोंकी बुद्धि ही विषम हुआ करती है॥ २९॥
न वेद कश्चिद्भगवंश्चिकीर्षितं तवेहमानस्य नृणां विडम्बनम्।
न यस्य कश्चिद्दयितोऽस्ति कर्हिचिद् द्वेष्यश्च यस्मिन् विषमा मतिर्नृणाम्॥ २९
भगवन्! आप जब मनुष्योंकी-सी लीला करते हैं, तब आप क्या करना चाहते हैं—यह कोई नहीं जानता। आपका कभी कोई न प्रिय है और न अप्रिय। आपके सम्बन्धमें लोगोंकी बुद्धि ही विषम हुआ करती है॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.8.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 116) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/8/29/