॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.8.31
गोप्याददे त्वयि कृतागसि दाम तावद् या ते द२शाश्रुकलिलाञ्जनसम्भ्रमाक्षम्।
वक्त्रं निनीय भयभावनया स्थितस्य सा मां विमोहयति भीरपि यद्बिभेति॥ ३१
gopyādade tvayi kṛtāgasi dāma tāvad yā te daśāśrukalilāñjanasambhramākṣam|
vaktraṃ ninīya bhayabhāvanayā sthitasya sā māṃ vimohayati bhīrapi yadbibheti|| 31
अर्थ
जब बचपनमें आपने दूधकी मटकी फोड़कर यशोदा मैयाको खिझा दिया था और उन्होंने आपको बाँधनेके लिये हाथमें रस्सी ली थी, तब आपकी आँखोंमें आँसू छलक आये थे, काजल कपोलोंपर बह चला था, नेत्र चंचल हो रहे थे और भयकी भावनासे आपने अपने मुखको नीचेकी ओर झुका लिया था! आपकी उस दशाका—लीला-छबिका ध्यान करके मैं मोहित हो जाती हूँ। भला, जिससे भय भी भय मानता है, उसकी यह दशा!॥ ३१॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—मृषा०।